गाजा · निशाने पर बच्चे
गाजा के बच्चे स्कूल लौटे, अब रास्ते में ही मारे जा रहे हैं
19 सितंबर को कक्षाएं फिर शुरू हुईं। तब से इस्राइली हमलों और स्नाइपर फायरिंग में बच्चे घर लौटते हुए, प्रार्थना सभा में और खिसकती 'येलो लाइन' के पास मारे गए हैं।
मोहम्मद हमद 14 साल का था, आठवीं कक्षा का छात्र और अपनी क्लास के सबसे अच्छे बच्चों में से एक। 17 अक्टूबर को वह देर अल-बलाह के एक अस्थायी स्कूल से पढ़ाई खत्म कर अपने 10 साल के भाई अब्दुल्ला के साथ अल-बरका मोहल्ले से होकर घर लौट रहा था। तभी एक इस्राइली हमला उसी सड़क पर हुआ जिस पर दोनों चल रहे थे। मोहम्मद और पास में मौजूद एक व्यक्ति की मौत हो गई। अब्दुल्ला बच गया।
देर अल-बलाह में परिवार के तंबू से उसके 44 वर्षीय पिता रियाद हमद ने कहा, "वह सिर्फ मेरा बेटा नहीं, मेरा दोस्त था। वह बहुत अच्छा कर रहा था।"
युद्धविराम के एक साल बाद गाजा के बच्चे स्कूल लौट आए हैं, और स्कूल के रास्ते में मारे जा रहे हैं।
कक्षाएं लौटीं, गोलियां भी
युद्ध के कारण करीब तीन साल की रुकावट के बाद गाजा में 19 सितंबर को शैक्षणिक सत्र फिर शुरू हुआ। लेकिन इस्राइली हमले और स्नाइपर फायरिंग जारी रही।
गाजा के शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक:
- 18 से 24 अक्टूबर के बीच छह से 16 साल के 10 बच्चे और एक शिक्षक मारे गए
- 21 अक्टूबर को जबालिया के मुरादिया स्कूल में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान दो लड़कियां घायल हुईं
- पिछले रविवार को गाजा सिटी में इस्लामिक यूनिवर्सिटी परिसर पर हमले में पांच छात्र घायल हुए, कुछ की हालत गंभीर है
मंत्रालय ने छात्रों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों की सुरक्षा के लिए तुरंत अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की मांग की है।
गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, अक्टूबर 2025 में युद्धविराम लागू होने के बाद से इस्राइल ने गाजा में कम से कम 1,574 फलस्तीनियों को मारा है और 5,687 को घायल किया है।
येलो लाइन
सबसे ज्यादा खतरा तथाकथित येलो लाइन के पास है, जिसने अक्टूबर 2025 के युद्धविराम समझौते के तहत गाजा को इस्राइली और फलस्तीनी नियंत्रण में बांटा था। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक यह लाइन तब से पश्चिम की ओर खिसक गई है, जिससे इस्राइल का गाजा के 65 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर नियंत्रण हो गया है, जबकि एक साल पहले 53 प्रतिशत पर सहमति बनी थी।
इस लाइन के पास कम से कम 66 फलस्तीनी बच्चे मारे गए हैं। इसके आसपास से गुजरने वाले छात्र और शिक्षक स्नाइपरों और बमों के खतरे में बने रहते हैं।
21 अक्टूबर को चौथी कक्षा की छात्रा सुआद अब्द रब्बो बस्ता और किताबें लेकर स्कूल गई। कुछ देर बाद उसकी बड़ी बहन चिल्लाते हुए घर भागी कि सुआद को गोली लग गई है। उसकी मां आलिया अब्द रब्बो ने याद किया, "मैं नंगे पांव बाहर भागी। वह खून से लथपथ थी, रो रही थी, चीख रही थी।"
एक परिवार का डर
हमद परिवार के लिए अब स्कूल का रास्ता डर का दूसरा नाम है। अब्दुल्ला, जो रोज भाई के साथ स्कूल आता-जाता था, अब अकेले जाने से डरता है, और अपने पिता को भी खो देने से।
रियाद हमद ने कहा, "हम डर में जी रहे हैं। पैदल चलते हुए या कार में बैठे हुए भी मेरा दिल डर से भरा रहता है।"
उन्होंने कहा, "बेटे को पिता को दफनाना चाहिए, न कि पिता को बेटे को। उन्होंने चीजों का क्रम ही उलट दिया है।"
रायसीना वायर विश्लेषण
युद्धविराम की कसौटी यह है कि बच्चे स्कूल जाकर घर लौट पाते हैं या नहीं। इस कसौटी पर गाजा का युद्धविराम नाकाम रहा है: सितंबर में कक्षाएं खुलीं और कुछ ही हफ्तों में बच्चे सड़क पर, प्रार्थना सभा में और विश्वविद्यालय परिसर में मारे जाने लगे।
खिसकती येलो लाइन उतनी ही अहम है जितने खुद हमले। हर बार जब यह पश्चिम की ओर बढ़ती है, तो और घर, तंबू और अस्थायी स्कूल निशाने की जद में आ जाते हैं, और रोज का स्कूल का रास्ता एक ऐसा जोखिम बन जाता है जिसे परिवारों को हर सुबह तौलना पड़ता है।
भारत, जो लंबे समय से बातचीत से दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है और गाजा को मानवीय सहायता भेजता है, के लिए सबक यह है कि कागज पर युद्धविराम जमीन पर सुरक्षा के बराबर नहीं है। जब तक लाइन तय नहीं होती और स्कूल सुरक्षित नहीं बनते, करीब तीन साल की पढ़ाई पहले ही गंवा चुकी एक पीढ़ी और गंवाती रहेगी।