भारत · औद्योगिक नीति
3,030 करोड़ के केमिकल पार्क: ढांचा बनाना आसान, असली चुनौती आगे
भव्य रसायन योजना में आयात घटाने के लिए तीन पार्क बनेंगे। विशेषज्ञों के मुताबिक एंकर निवेशक और लैब से प्लांट तक की मदद तय करेगी कि यह कामयाब हो।

भारत आयात किए गए रसायनों पर अपनी निर्भरता घटाने के लिए तीन नए केमिकल पार्कों पर 3,030 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है। इस पैसे से जमीन, पाइपलाइन और प्लांट तैयार होंगे। लेकिन इससे पूरा उद्योग खड़ा होगा या नहीं, यह अलग सवाल है, और अब तक के अनुभव से इसकी गारंटी नहीं है।
ये पार्क भारत औद्योगिक विकास योजना रसायन, यानी भव्य रसायन (BHAVYA Rasayan), का मुख्य हिस्सा हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसे जुलाई में मंजूरी दी थी और यह वित्त वर्ष 2026–27 से 2030–31 तक चलेगी। द सेक्रेटेरिएट में 19 अक्टूबर 2026 को छपी आदित्य आनंद की रिपोर्ट में विशेषज्ञों का कहना है कि इस योजना को उसके बनाए ढांचे से नहीं, बल्कि उससे खड़े होने वाले मैन्युफैक्चरिंग तंत्र से आंका जाएगा।
एक रणनीतिक कमी
भारत में बनने वाली लगभग हर चीज में रसायन लगते हैं, खाद और प्लास्टिक से लेकर दवाओं तक। नीति आयोग के मुताबिक 2023 में प्रमुख रासायनिक उत्पादों पर भारत का व्यापार घाटा 31 अरब डॉलर रहा।
मेथनॉल से समस्या का आकार समझ आता है। यह फॉर्मेल्डिहाइड और एसिटिक एसिड बनाने का बुनियादी कच्चा माल है। भारत में इसकी खपत सालाना 3,309 किलो टन (वित्त वर्ष 2024–25) है, और इसका 85–90% हिस्सा आयात होता है। अनुमान है कि यह निर्भरता वित्त वर्ष 2029–30 तक बनी रहेगी।
उद्योग के एक विशेषज्ञ ने द सेक्रेटेरिएट से कहा कि भारत को केवल आयात घटाने पर नहीं, बल्कि अपनी निर्यात वैल्यू चेन को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाने पर भी ध्यान देना चाहिए, भले ही कुछ कच्चा माल हमेशा बाहर से मंगाना पड़े।
योजना में क्या है
हर पार्क को केंद्र से अधिकतम 1,000 करोड़ रुपये और मेजबान राज्य से कम से कम 500 करोड़ रुपये मिल सकते हैं। हर पार्क कम से कम 8 वर्ग किलोमीटर की एक साथ जुड़ी, बिना विवाद वाली जमीन पर होना चाहिए, जिसमें साझा कचरा शोधन, जल व्यवस्था, सॉल्वेंट रिकवरी, स्टीम नेटवर्क और भंडारण व लॉजिस्टिक्स की सुविधा हो।
चयन के ढांचे में 100 में से 50 अंक जमीन, समुद्र से नजदीकी और परिवहन संपर्क को दिए गए हैं।
योजना में अभी क्या नहीं है, यह भी उतना ही अहम है। अब तक कोई एंकर निवेशक या अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम प्रतिबद्धता तय नहीं हुई है। दिशानिर्देशों में टेस्टिंग और तकनीकी सहायता का खर्च शामिल है, लेकिन पहले अपनाने वालों के ट्रायल, पायलट स्तर के उत्पादन या व्यावसायीकरण अनुदान का नहीं।
सिर्फ पार्क से क्लस्टर क्यों नहीं बनते
पायल इंडस्ट्रियल पार्क्स, अरेटे ग्रुप के निदेशक सिराज सैयद ने कहा, "केमिकल पार्क तब इकोसिस्टम बनता है, जब एक कंपनी का उत्पादन दूसरी कंपनी का कच्चा माल बन सके।" सिंगापुर का जुरोंग द्वीप, जहां उत्पादक साझा यूटिलिटी, पाइपलाइन और लॉजिस्टिक्स से जुड़े हैं, वह पैमाना है जिस पर भारत को परखा जाता है।
भारत का अपना रिकॉर्ड मिला-जुला है। दहेज, विशाखापत्तनम-काकीनाडा और पारादीप में चल रहे तीन पेट्रोलियम, केमिकल्स एंड पेट्रोकेमिकल्स इन्वेस्टमेंट रीजन (PCPIR) में संसद में दिए गए एक जवाब के मुताबिक 2,246 रासायनिक इकाइयां चल रही हैं, 3,49,192 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है और 3.7 लाख नौकरियां बनी हैं। ये आंकड़े गतिविधि दिखाते हैं। लेकिन इनसे यह पता नहीं चलता कि इन क्षेत्रों ने डाउनस्ट्रीम जुड़ाव कितना गहरा किया, देश में मूल्यवर्धन कितना बढ़ाया या आयात की जगह कितना लिया।
सैयद का नुस्खा तालमेल है: जमीन, एंकर निवेश, यूटिलिटी, पर्यावरण ढांचा, लॉजिस्टिक्स और डाउनस्ट्रीम उद्योग, सब एक साथ आने चाहिए।
लैब से प्लांट तक की खाई
असली मुश्किल शायद नई केमिस्ट्री को लैब से बाहर निकालना है। बायोकलर बनाने वाली कंपनी केबीकोल्स साइंसेज की संस्थापक और निदेशक वैशाली कुलकर्णी ने कहा, "सबसे बड़ी खाई यह साबित करने में है कि कोई चीज काम करती है, और यह साबित करने में कि वह औद्योगिक पैमाने पर बार-बार काम करती है।"
उत्पादन बढ़ाने के लिए पायलट उपकरण, प्रोसेस सपोर्ट, गुणवत्ता जांच, सुरक्षा व्यवस्था और ऐसे ग्राहक चाहिए, जो ऐसा उत्पाद आजमाने को तैयार हों जो शुरू में पुराने विकल्प से महंगा पड़ सकता है। कुलकर्णी चाहती हैं कि पार्क सब्सिडी वाले ट्रायल, साझा पायलट सुविधाओं, डेमो फंडिंग या जोखिम बांटने वाली दूसरी योजनाओं से पहले अपनाने वालों की मदद करें। भव्य रसायन में अभी यह सुविधा नहीं है।
असली परीक्षा
पार्क तभी सफल होंगे, जब वे कच्चे माल, ढांचे, तकनीक और ग्राहकों को जोड़कर भारत में सस्ते और ज्यादा प्रतिस्पर्धी उत्पाद तैयार करें। इसका मतलब है जगह का चुनाव सिर्फ तैयार जमीन देखकर नहीं, बल्कि लक्षित वैल्यू चेन से मेल, कच्चे माल की वास्तविक उपलब्धता और एंकर मांग देखकर करना। विशेषज्ञ ने चेताया कि हर वैल्यू चेन को अलग तरह की मदद चाहिए, इसलिए सबके लिए एक जैसा तरीका शायद काम न करे।
इसका मतलब सही चीजों को मापना भी है। घोषित निवेश और शुरू हुई इकाइयां गिनना आसान है। उत्पादन शुरू होने में लगा समय, क्षमता का इस्तेमाल, देश में हुआ मूल्यवर्धन, उद्योगों का आपसी जुड़ाव और निर्यात कहीं बेहतर बताते हैं कि भारत रसायनों की अपनी कमी सच में पाट रहा है या नहीं।