वेनेजुएला · राजनीति
10 महीने के निर्वासन के बाद मचाडो वेनेजुएला लौटीं: "मैं यहां हूं। आपके साथ"
नोबेल विजेता की वापसी अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज की परीक्षा है, जो तय अवधि के बाद भी पद पर हैं और चुनाव तय नहीं; ट्रंप के दांव की भी

मारिया कोरिना मचाडो वेनेजुएला लौट आई हैं। विपक्ष की नेता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता करीब दस महीने के निर्वासन के बाद रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को अपने देश में फिर दिखीं, और X पर एक छोटी पोस्ट में अपनी वापसी का ऐलान किया: "मैं यहां हूं। आपके साथ।"
CBS न्यूज और ब्लूमबर्ग के मुताबिक, उन्होंने यह नहीं बताया कि वह देश में कैसे दाखिल हुईं या कहां हैं। एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार, उनकी पार्टी वेंते वेनेजुएला की जारी तस्वीरों में वह बार्कीसिमेटो के एक चर्च में समर्थकों से मिलती दिखीं।
उनके सहयोगी, निर्वासित विपक्षी राष्ट्रपति उम्मीदवार एडमुंडो गोंजालेज ने तुरंत इसकी पुष्टि की। फ्रांस 24 की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने लिखा, "मुझे आपको यह बताते हुए बेहद खुशी है कि हमारी नेता, मेरी प्रिय मारिया कोरिना, वेनेजुएला की धरती पर हैं।"
उनकी गैरमौजूदगी में बदल गया देश
मचाडो आखिरी बार दिसंबर में वेनेजुएला में दिखी थीं। उसके करीब एक महीने बाद, जनवरी में, अमेरिकी सेना ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सत्ता से हटा दिया।
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को अमेरिका ले जाया गया, जहां उन पर नार्को-आतंकवाद की साजिश, कोकीन आयात की साजिश और हथियारों से जुड़े अपराधों समेत संघीय आरोप हैं। दोनों ने खुद को निर्दोष बताया है।
सत्ता मादुरो की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज के हाथ में आई, जो अंतरिम राष्ट्रपति बनीं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार उनका समर्थन किया है और वेनेजुएला के तेल उत्पादन व दूसरे कारोबार में अमेरिकी कंपनियों के सौदों का स्वागत किया है।
चुनाव का सवाल
यह व्यवस्था अब दबाव में है। AP और फ्रांस 24 के मुताबिक, रोड्रिगेज कार्यवाहक राष्ट्रपति के तौर पर तय अवधि से ज्यादा समय से पद पर हैं, और कोई चुनाव तय नहीं हुआ है। मचाडो की वापसी से तीन दिन पहले उनके समर्थकों ने काराकास में रैली कर राष्ट्रपति चुनाव की तारीख की मांग की थी।
मचाडो की घर वापसी से इस मांग को नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया है। ब्लूमबर्ग ने इसे रोड्रिगेज की राजनीतिक खुलेपन की नीति, और मादुरो के बाद के वेनेजुएला के लिए ट्रंप प्रशासन की रणनीति की अब तक की शायद सबसे बड़ी परीक्षा बताया। यह रणनीति अब तक रोड्रिगेज और कारोबारी सौदों के समर्थन पर टिकी रही है, और चुनाव की कोई तारीख तय नहीं है।
भारत की नजर क्यों है
भारत के लिए वेनेजुएला का महत्व मुख्य रूप से तेल से है। जैसा कि Raisina Wire ने पिछले हफ्ते अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की यात्रा के दौरान बताया था, वॉशिंगटन भारतीय रिफाइनरियों को वेनेजुएला का ज्यादा कच्चा तेल प्रोसेस करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, और रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी जैसे परिसर उस देश के भारी ग्रेड के तेल को संभाल सकते हैं।
ऐसा कोई भी व्यापार इस पर निर्भर करता है कि काराकास में किसकी सरकार है, और किन शर्तों पर। अगर वेनेजुएला खुली राजनीतिक होड़ की ओर बढ़ता है, तो उसके तेल समझौतों पर सवाल उठ सकते हैं। अगर वह अमेरिका समर्थित अंतरिम व्यवस्था में टिक जाता है, तो आपूर्ति ज्यादा स्थिर हो सकती है, पर लोकतांत्रिक वैधता कम होगी।
नई दिल्ली के लिए सबक जाना-पहचाना है: किसी राजनीतिक समझौते से बंधे ऊर्जा सौदे उतने ही टिकाऊ होते हैं, जितना वह समझौता।
मचाडो ने अब चुनाव कराने के लिए दबाव बनाने पर अपनी मौजूदगी दांव पर लगा दी है। रोड्रिगेज और वॉशिंगटन आगे क्या करते हैं, इसी से तय होगा कि मादुरो के बाद वेनेजुएला का बदलाव खुलेगा या सिमट जाएगा।