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भारत–अमेरिका · ऊर्जा कूटनीति

रूसी डीज़ल पर राहत से भारत को फ़ायदा, लेकिन अमेरिका की अस्थिर नीति हमेशा साथ नहीं देगी

रूसी तेल पर ट्रंप के यू-टर्न से भारत-अमेरिका रिश्तों और व्यापार समझौते पर दबाव घटा। अगला मोड़ इतना अनुकूल न हो।

रूसी तेल पर वॉशिंगटन के ताज़ा पलटाव से नई दिल्ली को एक दुर्लभ राहत मिली है। लेकिन जो अनिश्चितता आज भारत के काम आ रही है, उसी ने पहले भारत को भारी नुकसान पहुँचाया है, और आगे भी पहुँचाएगी।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से डीज़ल ख़रीदने का फ़ैसला किया है। इस क़दम ने उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी को भी चौंका दिया, जो यूक्रेन युद्ध ख़त्म करने के लिए मॉस्को की तेल आमदनी घटाने की नीति का समर्थन करती रही है। इसके तुरंत बाद 60 दिन की छूट दी गई, जिससे सीनेटर लिंडसे ग्राहम का वह नया क़ानून टल गया जो रूसी तेल आयात करने वाले देशों पर भारी टैरिफ़ लगाने की बात करता है।

21 अक्टूबर 2026 को द सेक्रेटेरिएट में लिखते हुए वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार सुषमा रामचंद्रन का तर्क है कि यह यू-टर्न किसी बड़ी रणनीति का नहीं, बल्कि अमेरिकी घरेलू राजनीति का नतीजा है, और भारत को इसे स्थायी बदलाव नहीं मानना चाहिए।

मध्यावधि चुनाव से पहले पंप की क़ीमतें

इसकी जड़ अमेरिका में ईंधन की क़ीमतें हैं। वहाँ खुदरा दाम सीधे वैश्विक बाज़ार के साथ चलते हैं। इसके उलट भारत में सरकारी तेल कंपनियाँ सरकार के मार्गदर्शन पर पंप की क़ीमतें तय करती हैं, इसलिए वैश्विक दाम चढ़ने के बावजूद यहाँ पेट्रोल और डीज़ल के दाम अपेक्षाकृत स्थिर रहे हैं।

रामचंद्रन के अनुसार, पिछले एक साल में अमेरिका में गैसोलीन (पेट्रोल) लगभग 3 डॉलर से बढ़कर 4.3 डॉलर प्रति गैलन हो गया है, जबकि डीज़ल लगभग दोगुना होकर 3.6 डॉलर से 6 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर पहुँच गया है। डीज़ल की मार सबसे ज़्यादा किसानों, ट्रक चालकों और पशुपालकों पर पड़ती है, जो ट्रंप के सबसे वफ़ादार मतदाताओं में हैं। नवंबर के मध्यावधि चुनावों से पहले सीएनएन पोल ऑफ़ पोल्स में उनकी लोकप्रियता 34% पर है, इसलिए व्हाइट हाउस पर पंप पर राहत दिखाने का दबाव है। अगर प्रतिनिधि सभा हाथ से निकल गई, तो उनके बाक़ी एजेंडे का बड़ा हिस्सा पारित कराना मुश्किल हो जाएगा।

एक सौदा, जो शायद पूरा न हो

समझौते के तहत पहले 3,00,000 टन रूसी डीज़ल आएगा, फिर नवंबर में 5,00,000 टन और दिसंबर में 10 लाख टन, और उसके कुछ समय बाद 30 लाख टन और देने का प्रस्ताव है। रूस यह आपूर्ति कर पाएगा या नहीं, यह साफ़ नहीं है। रूसी रिफ़ाइनरियों पर यूक्रेनी हमलों से रूस में ही ईंधन की कमी हो गई है, और उसने हाल में भारत से आपात स्थिति में पेट्रोल और डीज़ल ख़रीदा है। वॉशिंगटन ने कीव से रूस के ऊर्जा ढाँचे पर हमले रोकने को भी कहा है।

रामचंद्रन का तर्क है कि डीज़ल पहुँच भी जाए, तो अमेरिकी बाज़ार के लिहाज़ से यह मात्रा इतनी छोटी है कि क़ीमतों में ख़ास कमी नहीं आएगी।

इस योजना से यूक्रेन और यूरोप चिंतित हैं। यूरोपीय संघ का कहना है कि युद्ध ख़त्म करने का एकमात्र रास्ता रूस पर दबाव बनाए रखना है, और उसे साफ़ तौर पर डर है कि तेल से होने वाली अतिरिक्त कमाई रूसी अर्थव्यवस्था को सँभाल देगी। इस बीच तेल बाज़ार अस्थिर बने हुए हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान के ख़तरे और सऊदी अरब पर हूती हमलों की आशंका ने ब्रेंट क्रूड को लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँचा दिया है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक़ खाड़ी से कच्चे तेल का प्रवाह अमेरिका-ईरान युद्ध से पहले के स्तर के लगभग 80% तक लौट आया है, लेकिन डीज़ल जैसे परिष्कृत उत्पाद अब भी कम हैं।

भारत को फ़ायदा, फ़िलहाल

भारत के लिए तात्कालिक असर अच्छा है। ग्राहम क़ानून पर रोक और रूसी डीज़ल की ख़रीद से उस रिश्ते पर दबाव घटता है जो हाल में काफ़ी तनाव में रहा है। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने रूस पर प्रतिबंधों में नरमी को भारत जैसे साझेदारों के समर्थन के रूप में पेश किया है, जो रूसी ऊर्जा की ख़रीद आसानी से बंद नहीं कर सकते।

व्यापार के लिहाज़ से भी समय अहम है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौता महीनों से अटका है, दोनों पक्ष बार-बार कहते रहे हैं कि यह लगभग तैयार है, और रूसी तेल का आयात इसमें एक बड़ी अड़चन रहा है। दोनों तरफ़ के अधिकारियों के हालिया बयानों से लगता है कि ज़्यादातर विवादित मुद्दे सुलझ गए हैं और जल्द घोषणा हो सकती है।

झटकों की क़ीमत

असली समस्या अनिश्चितता है। देशों के बीच स्थिर रिश्तों के लिए उन मुद्दों पर लगातार समर्थन ज़रूरी है, जिन्हें दोनों पक्ष अहम मानते हैं। रामचंद्रन कहती हैं कि अब तक टैरिफ़ और ऊर्जा आपूर्ति पर अमेरिका के अचानक बदलावों का सबसे ज़्यादा बोझ भारत ने उठाया है। इस बार पासा भारत के पक्ष में पड़ा है; अगली बार ऐसा ज़रूरी नहीं।

नई दिल्ली के लिए सबक़ यह है कि इस राहत का फ़ायदा उठाए, मौक़ा रहते व्यापार समझौता पूरा करे, और अपनी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोत इतने विविध रखे कि वॉशिंगटन के अगले मोड़ को झेल सके। ट्रंप के बाक़ी कार्यकाल में भारत-अमेरिका रिश्तों को और झटकों के लिए तैयार रहना चाहिए।

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